तीन युवाओं ने हिला दी CBSE की पूरी अर्थ व्यवस्था, जानिए कौन हैं वेदांत, निसर्ग और सार्थक
देश के सबसे बड़े शिक्षा बोर्डों में से एक CBSE इन दिनों अपनी नई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर विवादों के केंद्र में है। इस पूरे मामले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये सवाल किसी राजनीतिक दल, संगठन या बड़ी संस्था ने नहीं, बल्कि तीन युवा छात्रों – वेदांत श्रीवास्तव, सार्थक सिद्धांत और निसर्ग अधिकारी ने उठाए हैं।
इन तीनों युवाओं के दावों और खुलासों ने मूल्यांकन प्रक्रिया की पारदर्शिता, डिजिटल सुरक्षा और सरकारी टेंडरिंग प्रक्रिया को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। यह घटना इस बात का उदाहरण बनकर सामने आई है कि आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया, डेटा विश्लेषण और तकनीकी ज्ञान के माध्यम से संस्थाओं से जवाबदेही की मांग कर रही है।
वेदांत श्रीवास्तव ने उठाया उत्तर पुस्तिका का मुद्दा
इस विवाद की शुरुआत 17 वर्षीय छात्र वेदांत श्रीवास्तव से हुई। वेदांत ने CBSE की पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया के तहत अपनी उत्तर पुस्तिका की जांच के लिए आवेदन किया था।
वेदांत ने आरोप लगाया कि जांच के दौरान उन्हें जो उत्तर पुस्तिका उपलब्ध कराई गई, वह उनकी नहीं बल्कि किसी अन्य छात्र की भौतिकी (फिजिक्स) की कॉपी थी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कथित गलती से जुड़े स्क्रीनशॉट और दस्तावेज साझा किए, जिसके बाद यह मामला तेजी से वायरल हो गया।
इस दावे ने बोर्ड की उत्तर पुस्तिका प्रबंधन और सत्यापन प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में छात्रों और अभिभावकों ने इस घटना को लेकर चिंता व्यक्त की और मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की।
निसर्ग अधिकारी ने साइबर सुरक्षा की खामियों का किया खुलासा
जहां वेदांत ने मूल्यांकन प्रक्रिया की सटीकता पर सवाल उठाए, वहीं 19 वर्षीय एथिकल हैकर निसर्ग अधिकारी ने CBSE की डिजिटल सुरक्षा प्रणाली को चुनौती दी।
निसर्ग का दावा है कि उन्होंने CBSE के ऑनलाइन मार्किंग पोर्टल में गंभीर सुरक्षा खामियों की पहचान की थी। उनके अनुसार इन कमजोरियों का फायदा उठाकर संवेदनशील परीक्षा डेटा तक पहुंच बनाई जा सकती थी।
निसर्ग ने कहा कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में उन्होंने पहले संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी दी थी। हालांकि समय पर कार्रवाई नहीं होने की खबर मिलने के बाद उन्होंने इस मुद्दे को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर दिया।
मामला सामने आने के बाद CBSE ने स्वीकार किया कि पोर्टल में कुछ तकनीकी कमजोरियां थीं, जिन्हें बाद में सुधार लिया गया। बोर्ड ने यह भी कहा कि प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित है और किसी महत्वपूर्ण डेटा से छेड़छाड़ नहीं हुई है।
सार्थक सिद्धांत ने OSM टेंडर प्रक्रिया पर उठाए सवाल
CBSE OSM विवाद का तीसरा और सबसे चर्चित पहलू 18 वर्षीय सार्थक सिद्धांत की जांच से सामने आया। सार्थक ने ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (OSM) से जुड़े टेंडर दस्तावेजों का अध्ययन किया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उसका विस्तृत विश्लेषण साझा किया।
उन्होंने दावा किया कि टेंडर की कुछ शर्तें कथित तौर पर एक विशेष कंपनी ‘COEMPT’ को लाभ पहुंचाने वाली प्रतीत होती हैं।
सार्थक ने दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर सवाल उठाया कि क्या टेंडर प्रक्रिया वास्तव में पूरी तरह निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी है। उनकी पोस्ट और रिपोर्ट तेजी से वायरल हुईं और बाद में कई मीडिया संस्थानों ने भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।
दिलचस्प बात यह है कि सार्थक केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर मीडिया से भी बातचीत की, जिससे यह मामला और अधिक चर्चा में आ गया।
युवाओं की डिजिटल सक्रियता का नया उदाहरण
वेदांत, निसर्ग और सार्थक की कहानी एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करती है। पहले जहां छात्र अपनी समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन या ज्ञापन का सहारा लेते थे, वहीं आज की पीढ़ी डेटा, तकनीक, साइबर रिसर्च और सोशल मीडिया के जरिए जवाबदेही की मांग कर रही है।
तीनों युवाओं ने अलग-अलग क्षेत्रों – मूल्यांकन प्रक्रिया, साइबर सुरक्षा और टेंडरिंग सिस्टम – से जुड़े सवाल उठाए, लेकिन उनका उद्देश्य एक ही था: जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
CBSE हर वर्ष लाखों छात्रों की परीक्षाओं का आयोजन करता है। ऐसे में उत्तर पुस्तिकाओं की सुरक्षा, डिजिटल पोर्टल की मजबूती और मूल्यांकन प्रणाली की निष्पक्षता जैसे मुद्दे बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
वेदांत श्रीवास्तव के उत्तर पुस्तिका विवाद, निसर्ग अधिकारी की साइबर सुरक्षा चेतावनियों और सार्थक सिद्धांत की टेंडर प्रक्रिया संबंधी जांच ने यह दिखाया है कि तकनीकी रूप से जागरूक युवा भी बड़ी संस्थाओं की कार्यप्रणाली की समीक्षा कर सकते हैं।
यही कारण है कि CBSE OSM विवाद अब केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह पारदर्शिता, डिजिटल सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है।